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Monday, 13 May 2013

गज़ल्

                 गज़ल

दुखाकर तुमने दिल मेरा, मुझे दिल तक हिलाया है.
मगर  है  शुक्रिया  तुमने मुझे, मुझसे  मिलाया  है.

अपेक्षा मेँ निराशा है, ये आखिर मेँ समझ पाया,
औलाद है शिक्षक, सबब ये तुमने, जब पढाया है.

हमने   सुना  है  और,  अनुभव  से  भी  सीखा  है-  सबब,
सिर्फ जड से ही, फुनगियोँ तक को, प्राणाधार मिलता है.



ढेर  विशयोँ  की  खुली हैँ, पाठशालायेँ,  जहाँ   मेँ  पर,
उनसे बढ कर, शब्द्वाणोँ से, असल है क्या, सिखाया है.

जो  नहीँ  सोचा था, सपनोँ  मेँ  कभी,मुमकिन  भी  होगा  वह्,
ज़िन्दगी का सच वही था सिर्फ, तुमने जो अब कर दिखाया है.
                       - डा. रघुनाथ मिश्र्







8 comments:

  1. औलाद है शिक्षक वाली पंक्ति में सबब की जगह सबक़ होना चाहिये । शायद टंकण में
    भूल के कारण अन्यत्र भी सबक़ की जगह सबब छप गया है ।

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    1. सटीक सुझाव के लिये सादर- विनम्र आभार सुदेश जी. टंकड की त्रुटि है.

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  2. Replies
    1. प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद दास जी.

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  3. Misra Ji! Bahut achchhi Ghazal hai. Aur khaskar blog mein bachche ka animated photo char chand laga raha hai.

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    1. आप की मस्ंगल कामनओँ का प्रतिफल है. आभार.

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (10-03-2014) को आज की अभिव्यक्ति; चर्चा मंच 1547 पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. शानदार गजल :)
    ____________________
    फॉलो किया, अब बराबर आता रहूँगा !!

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