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Wednesday, 13 January 2016

डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' पर केन्द्रित शेशाम्रित के 'सहज' विशेषांक में 'आकुल' की प्रस्तुति


’सहज’ सहज हैं सहज से, कह देते हैं बात।
धारा-प्रवाह सहज से, कहने में निष्‍णात।
कहने में निष्‍णात, विषय कोई सा भी हो।
कहते हैं बेबाक, सदन कोई सा भी हो।
कविपुंगव ने काव्‍य, रचे वे ‘सहज’ सहज हैं।
मेरे हैं प्रिय दोस्‍त, बिलाशक ‘सहज’ सहज हैं।
2-
सागर सा व्‍यक्तित्‍व है, जोश अपार अथाह।
जनवादी आक्रोश का, बहता काव्‍य प्रवाह।
बहता काव्‍य प्रवाह, वाक्‍चातुर्य प्रबल है।
मणिकांचन संयोग, राजनीति में दखल है।
’आकुल’ है कृतकृत्‍य, ‘सहज’ सा साथी पाकर।
बदल दिया संसार, भरा गागर में सागर।
-डॉ.गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल'

डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' के व्यक्तित्व - कृतित्व पर केन्द्रित 'सहज' विशेषांक में गोपाल क्रिसन भट्ट 'आकुल के दो कुण्डलिया छंद


’सहज’ सहज हैं सहज से, कह देते हैं बात।
धारा-प्रवाह सहज से, कहने में निष्‍णात।
कहने में निष्‍णात, विषय कोई सा भी हो।
कहते हैं बेबाक, सदन कोई सा भी हो।
कविपुंगव ने काव्‍य, रचे वे ‘सहज’ सहज हैं।
मेरे हैं प्रिय दोस्‍त, बिलाशक ‘सहज’ सहज हैं।
2-
सागर सा व्‍यक्तित्‍व है, जोश अपार अथाह।
जनवादी आक्रोश का, बहता काव्‍य प्रवाह।
बहता काव्‍य प्रवाह, वाक्‍चातुर्य प्रबल है।
मणिकांचन संयोग, राजनीति में दखल है।
’आकुल’ है कृतकृत्‍य, ‘सहज’ सा साथी पाकर।
बदल दिया संसार, भरा गागर में सागर।
-डॉ.गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल'

मुक्त छंद कविता

मरण तयशुदा
मालूम सबको
क्यूँ घबराएँ
मरने से.
जो होना है
हो के रहेगा
कुछ न बदलना
डरने से.
कर्म सिर्फ हाथों में है
कर लें बेहतर से बेहतर
जो पाएंगे -जब पाएंगे
पाएंगे बस करने से.
करें सार्थक
छोड़ें आलस
होनापन बस
बन्ने से.
-डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज


कुछ भी बनने से पहले सम्पूर्ण इंसान बनना जरूरी है. आध्यात्मिकता में अथवा भौतिक जगत में कितनी ही उन्नति क्यों न कर लें, लेकिन एक समग्र इंसान बने बिना, हमारी हर पहुँच अर्थहीन है.जिसे हम सुख समझते हैं और इंसानियत भूल, उसी में डूब जाते हैं, अंधे हो जाते हैं शेष दुनिया से, वही हमारे सारे दुखों की जड़ है. किताबें पढना -सिर्फ पढने के लिए और उनमें दी गयी शिक्षाओं को जीवन में नहीं उतारना -सूखी हड्डियां चबाने जैसा है.
(हमारे आध्यात्मिक गुरुदेव की नसीहतों का महत्वपूर्ण अंश )
-डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज'

सन्देश -विवेकानंद जयंती पर दिनांक १२/०१/१६

आइए स्वामी विवेकानन्द की 154 वीं जयन्ती पर,देश-दुनिया को उनकी महान देन -शिक्छाओं को श्रद्धा से याद करते हुए आज के दिन की शुरुआत करें। कुल 30 वर्षों के जीवन ्काल में स्वामी जी हमें हजारों वर्षों के बराबर दे गए .
-डा०रघुनाथ मिश्र 'सहज'
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Srijan....सृजन: मेरा एक अभी उपजा मुक्तक:

Srijan....सृजन: मेरा एक अभी उपजा मुक्तक:: आज कुछ वक़्त,बदला सा लगे है. वह भला इंसान, पगला सा लगे है. आंख जैसी कल थी, वैसी है मगर, सूर्य का प्रकाश,धुंधला सा लगे है. @डा.रघुनाथ मिश...

डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज के चुनिन्दा मुक्तक

बेटियों के भाग्य से, घर भर गया आनंद से.
दुर्भाग्य सर पर से टला, वह डर गया आनंद से.
जिन घरों में बेटियों ने, चैन की है सांस ली,
परिजनों का मन मुदित हो, तर गया आनंद से.
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लोढ़ी - सन्देश (मुक्तक)
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आज लोढ़ी पर्व को हम यूँ मनाएं.
प्यार की बगिया दिलों में हम सजाएँ.
नफरतों की फसल खेतों में न उपजे,
भेद - भावों के सभी गढ़- मठ ढहाएं.

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यदि रहना है सुखी दोस्तो, याद रखो अगला - पिछला.
यदि टिकना मानव मूल्यों पर,याद रखो अगला-पिछला.
निर्भर है खुद पर ही सारा, चाहे जैसे रह - जी लें ,
यदि खिलना चाहें फूलों सा,याद रखो अगला - पिछला.

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एक मुक्तक- अभी सृजित:
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सुप्रभात में सुप्रभात जैसा, शुभ - शुभ हो जाए.
मंजिल का राही चलकर, अपनी मंजिल पा जाए.
है मंगल कामना सभी के, हृदयों में हो प्रेम भरा,
भारत का जन- गण- मन, अपना हर खोया सुख पाए.

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आइए नववर्ष का, इस तरह अभिनन्दन करें।
छुद्र बातों में नहीं , भड़कें 'सहज' धीरज धरें।
आए हैं इस धरा पर हम, इक मनुज के रूप में,
शान से जिन्दा रहें और,शान से ही हम मरें।

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बिना कर्म परिणाम नहीं है.
बिन बदले आराम नहीं है.
उनका जीवन मरुथल सा है, 
जिनके साथ अवाम नहीं है. 

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-डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज'