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Sunday, 15 September 2013

डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:

डा.रघुनाथ मिश्र  'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:
            000
है भविष्य भी, वर्तमान का ही विस्तारित.
कल होता है, सिर्फ आज से ही निर्धारित.
अपमानित  चेक - वचन पत्र  - सिक्के,
तीनों  में, सिक्के  चुनना ही,  सर्वोचित.
भोजन - पानी - हवा जरूरी  माना  पर,
बहुत जरूरी है,  ए  सब हों,   बेलाक्षित.
दिल  है  अगर  साफ,  मत हो  बेकल,
चाहे जितनी जगह,  हुआ  तू  आरोपित.
क़ुदरत की है भेंट,  सभी  को ए धरती,
मत बोझिल हो, कहीं नहीं तू विस्थापित.
निर्णित जो  पहले,  पूरा कर ले  पहले,
छोड़ अभी का,आगे का मत कर निस्तारित.
             000
हर्ज़ नहीं है, करें  कमाई, जोड़ें - भोगें धन.
रहे मगर ए पाक-साफ,सुथरा-उजला जीवन.
श्रम  की कीमत  क्या है,  समझ जरूरी है.
बिना किये खाया-पीया, है झुलसाता तन-मन.
चोरी - छीनाझपटी - हेराफेरी-धोखाधड़ी सभी,
चुक जाते  हैं,  बाकी  रह जाता है, रीतापन.
दिल  व्यापक और  सोच  संकुचित, बेमानी,
बीते काले दिन की  यादें, छोड़ मिटे उलझन.
जैसे कर्म-विचार। छाप  है वही आत्मा  पर,
सच्चाई के लिये  देख, अपना ही दिल दर्पन.
सीमित किया हुआ है खुद को, जाति-धर्म से,
तोड़  सरहदें - हदें   सभी,  तो  बने  गगन.
             000
झरने - जंगल - नदी, यहाँ भी और वहाँ भी,
सौ वर्षों  की शदी , यहाँ  भी और वहां  भी.
रहो  अकेले,  बंद   रहें,  खिड़की - दरवाजे,
तुम्हें भला क्या पड़ी, यहाँ भी और वहां  भी.
शर्म-ओ- हया हटी, अस्मत  की खाक  उड़ी,
विवश आंख है मुदी, यहाँ भी और वहां  भी.
सबकी लाचारी - बदहाली - मुश्किल -उसकी.
होती  है  गुदगुदी,  यहाँ भी और वहां  भी.
सुरा -सुंदरी -ऐश खूब, तो पाप-पुन्य  क्या,
क्या है नेकी -बदी ,  यहाँ भी और वहां  भी.
उनका जीवन कटा, हवा  का एक झोंका सा,
मिरी जिंदगी  लदी, यहाँ भी और वहां  भी.
               000
बेटा  बीमार   है.
महंगा  उपचार है.
जिंदगी पहाड़  सी,
बोझिल  परिवार है.
सपना  सुखों   का,
हुआ  त र-तार  है.
सूझती  डगर  नहीं,
घना  अंधकार   है.
जियें तो जियें कैसे,
सांस भी  उधार  हैं.
कामगार  है  भूखा,
थोड़ी   पगार   है.
जवानी  है  घायल,
बचपन  लाचार  है.
जीवन  संग्राम  में,
भारी   संहार   है.
बाप  ने औसाद में,
छोड़ा   संसार   है.
     000
 -डा.रघुनाथ मिश्र  'सहज'

Monday, 26 August 2013

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal
आदरणीय कैलाश झा .किंकर' साहिब. आप ने बहुत सुब्दर ब्लॉग बनाया है.बधाई.
सादर,
सहज 

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal
आदरणीय कैलाश झा .किंकर' साहिब. आप ने बहुत सुब्दर ब्लॉग बनाया है.बधाई.
सादर,
सहज

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal
आदरणीय कैलाश झा .किंकर' साहिब. आप ने बहुत सुब्दर ब्लॉग बनाया है.बधाई.
सादर,
सहज

Friday, 16 August 2013

                    फेसबुक और मैं.

दोस्तों ! या तो मेरे ऑपरेट करने के तरीके में कोई कमी है या कोइ साज़िश मेरे खिलाफ़ चल रही है, जिसे मैं समझ नहीं पा रहा हूँ. फेसबुक मैंने ५ वर्ष पूर्व बनाया था, जो 16 जून' 13 तक सफलता पूर्वक चला. अचानक १७ जून'१३ को जब लोग इन किया तो लिखा हुआ आया " YOUR ACCOUNT HAS BEN TEMPORARILY SUSPENDED". फेसबुक ने आइडेन्टिटी वेरीफाई कराई .जो तकनीकी जानकारी कम होने से सफलता नहीं मिली. तदुपरांत एक के बाद एक -5 ऍफ़.बी. आई.डी. और बनाई औए धीरे -धीरे सभी बंद होती गयीं . आज अभी जब फेसबुक पर आया और लोग इन किया तो फिर वही - FB का रटा- रटाया फिर वाक्य दोहराया गया-PLEASE VERIFY YOUR IDENTITY. अंततः  मैं अब इस निष्कर्ष पर पहुंचा की लोग- मेरे ही कुछ अपने-ऍफ़.बी. टीम या अज्ञात कारणों से अब मैं ऍफ़.बी. नहीं चला पाउँगा. अतः भरी मन से ऍफ़.बी. को अलविदा कह रहा हूँ और मुझसे जुड़े सभी मित्रों-हमदर्दों-सहयोगियों का ह्रदय से आभारी हूँ, जिन्हों ने मुझे सराहा-प्रोत्साहित किया और हर क़दम पर मेरे साथ रहे.
फेसबुक से अलविदा कहते हुए आप सभी गूगल+ से जुड़े मित्रों से विनम्र अनुरोध है की वे अब मुझे नेरे ब्लॉग सृजन raghunathmisra.blogspot.in पर मिला करें और पढ़ा-पढाया करें और साथ ही अपने बहुमूल्य सुझावों/ प्रतिक्रियावों  से प्रोत्साहित किया करें.
साभिवादन-सादर-सप्रेम,
-डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

ghazal

करनी और कथनी में अंतर.
जीवन में चल रहा निरंतर.
काम नहीं तो दाम नहीं फिर,
कुछ न करेंगे जादू –मंतर.
कदमताल कर यूँ ही नाहक,
क्यूँ कर डाला नष्ट मुक़द्दर.
लड़ने चला जगत से पागल,
दुश्मन बैठा खुद के अन्दर.
करता रहा शिकायत सबकी,
झांक न पाया खुद के भीतर.
होगी जिसकी सोच सार्थक,
होगा वह ही मस्त कलंदर.
कर ले यदि छुट्टी नफ़रत से,
प्यार आएगा फाड़ के छप्पर.
मीत बना ले दिल को अपने,
बन जायेगा जीवन बेहतर.
लक्ष्य बने सर्वोच्च तभी ही,

कम से कम मिल सके उच्चतर.
-डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

DR.RAGHUNATH MMISHRA 'SAHAJ' KI GHAZAL.

ग़ज़ल:
आज़ाद है वतन सही, आज़ाद हम नहीं.
खाई गरीब अमीर की, अब भी ख़तम नहीं.
हमने संजोये थे कभी, खुशहालियों के ख्वाब,
आँखों में बाढ़ आज भी, अश्कों की कम नहीं.
रोटी की मांग पर हमें, हैं जेल- गोलियां,
चूल्हे भुझे पड़े थे जो, अब भी, गरम नहीं.
है देश आज भी उन्हीं, गुंडों के हाथ में,
खायेंगे बेच मुल्क वे, बीतेंगे ग़म नहीं.
निचुड़े हुए खू पर खड़े, शाही महल यहाँ,
लाशों के रोज़गार के, अड्डे हैं कम नहीं.
बुनियाद में भरी हुई है, रेत बेशुमार,
दिवार हिल रही है अब, मकाँ में दम नहीं.
दम तोड़तीं जवानियाँ, अरमां लिए हुए,
बाकि रहा उनके लिए, कोई सितम नहीं.
-डा.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
(मेरी पुस्तक 'सोच ले तू किधर जा रहा है'- (हिंदी-उर्दू ग़ज़ल संग्रह ) से.)