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Tuesday, 13 August 2013
Saturday, 10 August 2013
Saturday, 27 July 2013
दोहे
रुक-रुक कर आने लगी, है फिर से बरसात.
रिमझिम -रिमझिम की झड़ी ,भीग रहा मन-गात.
कृषकों में आल्हाद है , लहरायेंगे खेत.
आएगा सब लौट अब , बिगाड़ा ब्याज समेत
महंगाई की मार से, जीवन हुआ तबाह.
झड़ी लगी बरसात की, अब होगी फिर वाह.
आसमान से अनवरत, बरस रही है आस.
अब अंधियारा फाड़ कर, आई ज्यूँ उजियास.
अभिनन्दन बारिश तेरा, करती धरती आज.
जलसा सा माहौल है, है खुशियों का साज.
_डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'
चुनिन्दा मुक्तक
बैर कुदर त से, कभी चलता नहीं.
बिन किये खाया, सदा पचता नहीं.
आदमी ने लाख कोशिश कर लिए,
कर्म बिन इतिहास है बनता नहीं.
000
कर्म बिना कुछ दे न सके भगवान.
बिना बने कुछ काम न आये ज्ञान.
प्यार नहीं जिसमें गरीब वो सख्स बड़ा,
है जिसमें भाई-चारा वह ही धनवान.
000
जिंदगी बस जिंदगी है.
वो खुद ही बंद गी है.
बचना है किसी से तो,
वो सिर्फ गन्दगी है.
000
-डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज'
बिन किये खाया, सदा पचता नहीं.
आदमी ने लाख कोशिश कर लिए,
कर्म बिन इतिहास है बनता नहीं.
000
कर्म बिना कुछ दे न सके भगवान.
बिना बने कुछ काम न आये ज्ञान.
प्यार नहीं जिसमें गरीब वो सख्स बड़ा,
है जिसमें भाई-चारा वह ही धनवान.
000
जिंदगी बस जिंदगी है.
वो खुद ही बंद गी है.
बचना है किसी से तो,
वो सिर्फ गन्दगी है.
000
-डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज'
दोहा
दोहा:
यश-अपयश को भूल जा, कर जीवन साकार.
खुदगर्जी को त्याग कर, ही मिलता
आधार.
डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज'
Monday, 22 July 2013
gazalen
डा. रघुनाथ मिश्र की दो गज़लें
000
देखा कुदरत का ऐसा कहर ना कभी.
देखा गुस्से का ऐसा असर ना कभी.
यूँ तो आना व जाना चला ही करे .
देखा होना यूँ अंतिम सफ़र ना कभी .
मार डाले न छोड़े किसी भी तरह.
देखी लहरों में ऐसी लहर ना कभी .
लेखनी लिख ग़ज़ल-गीत ऐसे सदा .
हों मुखर भाव टूटे बहर ना कभी .
कुछ करें अब असरदार यारो उठो .
बद्विचारों का लिले ज़हर ना कभी .
हो 'सहज' ज़िन्दगी जी लें जीभर सभी .
तू बुराई पे हरगिज़ ठहर ना कभी .
000
सुनता नहीं कोई है बात क्या कीजै .
दुश्मन लगा रहा है घात क्या कीजै .
किसलय के पास आ रहा बसंत यकीनन .
डाली पे पक चुके जो पात क्या कीजै .
चंद मर गए अजीर्ण से है समाचार में .
गावों में भूख पर उत्पात क्या कीजै .
चुनाव आ गए हैं सर पे इस लिए शायद .
उठा लिया है अब आपात क्या कीजै .
कुदरत से थी तनातनी सदियों से चल रही .
यकबयक ये बज्रपात क्या कीजै .
वो था अतीत लौट कर न आयेगा कभी .
आज के हैं हाथ में हालात क्या कीजै .
000
डा . रघुनाथ मिश्र 'सहज'
000
देखा कुदरत का ऐसा कहर ना कभी.
देखा गुस्से का ऐसा असर ना कभी.
यूँ तो आना व जाना चला ही करे .
देखा होना यूँ अंतिम सफ़र ना कभी .
मार डाले न छोड़े किसी भी तरह.
देखी लहरों में ऐसी लहर ना कभी .
लेखनी लिख ग़ज़ल-गीत ऐसे सदा .
हों मुखर भाव टूटे बहर ना कभी .
कुछ करें अब असरदार यारो उठो .
बद्विचारों का लिले ज़हर ना कभी .
हो 'सहज' ज़िन्दगी जी लें जीभर सभी .
तू बुराई पे हरगिज़ ठहर ना कभी .
000
सुनता नहीं कोई है बात क्या कीजै .
दुश्मन लगा रहा है घात क्या कीजै .
किसलय के पास आ रहा बसंत यकीनन .
डाली पे पक चुके जो पात क्या कीजै .
चंद मर गए अजीर्ण से है समाचार में .
गावों में भूख पर उत्पात क्या कीजै .
चुनाव आ गए हैं सर पे इस लिए शायद .
उठा लिया है अब आपात क्या कीजै .
कुदरत से थी तनातनी सदियों से चल रही .
यकबयक ये बज्रपात क्या कीजै .
वो था अतीत लौट कर न आयेगा कभी .
आज के हैं हाथ में हालात क्या कीजै .
000
डा . रघुनाथ मिश्र 'सहज'
दो छणिकाएं
दो छणिकाएं
आंसू
पी गया हूँ
मतलब
गम खा गया हूँ
ख़ुशी
महफूज़ रहे कैसे
वही करना /वैसे ही रहना
सीख गया हूँ
०००
प्यार
दिल में होता है
अन्दर है तो
पवित्र/ असली/ सर्वाधिक शक्तिशाली
इज़हार ज़रूरी नहीं
आँखों में दिख जाय
बिना संवाद समझ में आ जाय
वही है
नि:स्वार्थ/ असली/ निश्छल
प्यार
०००
डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'
आंसू
पी गया हूँ
मतलब
गम खा गया हूँ
ख़ुशी
महफूज़ रहे कैसे
वही करना /वैसे ही रहना
सीख गया हूँ
०००
प्यार
दिल में होता है
अन्दर है तो
पवित्र/ असली/ सर्वाधिक शक्तिशाली
इज़हार ज़रूरी नहीं
आँखों में दिख जाय
बिना संवाद समझ में आ जाय
वही है
नि:स्वार्थ/ असली/ निश्छल
प्यार
०००
डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'
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