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Monday, 13 May 2013

गज़ल्

                 गज़ल

दुखाकर तुमने दिल मेरा, मुझे दिल तक हिलाया है.
मगर  है  शुक्रिया  तुमने मुझे, मुझसे  मिलाया  है.

अपेक्षा मेँ निराशा है, ये आखिर मेँ समझ पाया,
औलाद है शिक्षक, सबब ये तुमने, जब पढाया है.

हमने   सुना  है  और,  अनुभव  से  भी  सीखा  है-  सबब,
सिर्फ जड से ही, फुनगियोँ तक को, प्राणाधार मिलता है.



ढेर  विशयोँ  की  खुली हैँ, पाठशालायेँ,  जहाँ   मेँ  पर,
उनसे बढ कर, शब्द्वाणोँ से, असल है क्या, सिखाया है.

जो  नहीँ  सोचा था, सपनोँ  मेँ  कभी,मुमकिन  भी  होगा  वह्,
ज़िन्दगी का सच वही था सिर्फ, तुमने जो अब कर दिखाया है.
                       - डा. रघुनाथ मिश्र्







Saturday, 4 May 2013

सान्निध्‍य दर्पण: अरुण सेदवाल, कोटा

सान्निध्‍य दर्पण: अरुण सेदवाल, कोटा: एक बकरे की व्‍यथा यह सही है यदि वह नहीं करता आत्‍महत्‍या तो कर दी जाती उसकी हत्‍या क्‍योंकि सही ही था उसका मरना अरुण सेदवाल (1943-2...

Wednesday, 17 April 2013

डा. रघुनाथ मिश्र की ताज़ा गज़ल.


 ग़ज़ल

लेखनी है लेखनी,रोटी नहीं मेरी.
बात बहुत बड़ी है,छोटी नहीं मेरी.

साफ़-साफ़ कह डाला, बस यूँ ही,
अब है मुसीबत में, लंगोटी मेरी.

दिक्कत न कभी कोई, पेश आई है,
कारण कि लिखावट, बड़ी मोटी मेरी.

अकाल मृतु ले गयी, उसकी  माँ को,
रोई  बडी, संवरी  नहीं, चोटी   मेरी.

ठीक   ही  आते रहे,  परिणाम सब्,
नियत  ना  रही , कभी  खोटी  मेरी .

देश   की   धरोहर हैं,    ये   सब,
रुधिर, माश ,  साँसें , बोटी    मेरी.

फरेबियोँ के साथ कभी भी निभी  नहीं,
आदत  है  यही  दोस्तों, खोटी  मेरी.
           ०००
-डा. रघुनाथ मिश्र्